Establishment of egalitarian society in independent India depended on Dhanna Seth: Dr. Dharmendra Kumar

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लेखक- डॉ धर्मेंद्र कुमार

बिन मांगे मोती मिले ,मांगे मिले न भीख l

मूर्धन्य विद्वान द्वारा यह पंक्ति शायद बहुत सोच-समझकर लिखी गई होगी कि चापलूस चाहे भिखारी की तरह रोज मांगे उन्हें भीख की तरह कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता l

किंतु वर्तमान में यह बिल्कुल उल्टा हो गया है चापलूस मौज मस्ती के साथ लग्जरी जीवन जी रहे हैं और विद्वान असहाय निराशा भाव से जीवन जीने पर मजबूर हैं l उन्हें मोती तो क्या ?मोती पिरोए जाने वाला धागा भी नसीब नहीं है l

आज के दौर में यह कटु सत्य है कि –

टूट कर बिखरा हुआ विद्वान होगा l
अब निराशा से भरा विद्वान होगा ll
जेब खाली बस निरादर झेल कर वह l
सोचता उत्थान की विद्वान होगा l

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